मेरे मन की व्यथा – गाँधी
[ यहाँ गाँधी के रूप में उन
सभी महान स्वतंत्रता कि बात कही गयी है जो इस मात्रभूमि के लिए अपने जीवन की आहूति
या बलिदान दे चुके है , फिर चाहे वो रानी लक्ष्मीबाई हो या भगतसिंह आजाद .....
]
मेरे मन की व्यथा – गाँधी
जन्मा तो दो अक्टूबर को मोहनदास नाम से ,
पर कुछ खास न दे पाया मातृभूमि के अत्यधिक प्यार से |
बस दिए थोड़े से विचार पर वह भी क्या विचार थे ?
भागवत,रामायण,कुरान और अधिक पुराण इनसे थोड़ी महान थे |
कहा अहिंसा करनी है ऐसे ही स्वतन्त्र हो पाएँगे ,
पर क्या पता था यह अहिंसा को हराम मान जायेंगे |
छलनी हुए करोड़ो तन वह भी मनुष्य की तृष्णा न छान सके |
इस मुश्किल भरी आजादी को सब पथ का पत्थर मान रहे ,
करते हिस्सेदारी जन्म से ,रूढ़ियों का दामन थाम रहे |
पुरुष है स्त्री से बेहतर अभी भी यह मान रहे |
पर भूल जाते जन्म दिया जिस उदर ने ,
उसी को काटने की लालसा ठान रहे |
जन्मे लड़के रूप में..खुद को महान मान रहे,
अरे ! क्या महान होंगे वो जो करके 35 टुकड़े अपने ईमान
को ढीक मान रहे |
कहीं दूँ अंतिम बात जो है मेरे विचलित मन के साथ कि –
मैंने क्यों दिलाई आजादी जो किसी को किसी से कम आँक
रही ,
कोई अमीर कोई गरीब हर किसी को बेहतर मान रहे |
होगा क्या उस वतन का जो दुःख सुन कहते यह तुम्हारा है
,
फिर भी कहे जाये ; सबसे अच्छा हिंदुस्तान हमारा है ||
लेखक – नीतेश बुनकर
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