BEST MOTIVATION SPEECH ABOUT TIME & LIFE
- ख़ुदी को कर बुलन्द इतना - 'के हर तक़दीर से पहले, ख़ुदा बन्दे से ख़ुद पूछे, बता तेरी रज़ा क्या है'।
- इसका अर्थ है कि 'इतने लायक़ बनो कि जीवन के हर मोड़ पर भगवान तुम्हारा भाग्य लिखते हुए तुम्ही से तुम्हारी जो मर्ज़ी हो पूछ कर लिख दे'।
- अगर आप भी अपनी तकदीर अपने हाथो से लिखना चाहते हो तो आपको अपने समय का एक - एक पल का पूरा -पूरा उपयोग करना पड़ेगा जिसके लिए आप को अपने हिसाब से एक समय तालिका यानि टाईमटेबल बनाना पड़ेगा और उसी के आधार पर चलना आरम्भ करना पड़ेगा
- कभी कभी ऐसा भी होगा की आप परिस्थियों से हारकर अपने विचारो को बदल कर अपने लक्ष्य से पीछे हटकर किसी दूसरी राह पर चल पड़े लेकिन कहते है न की मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है !
- अगर आप अपने अन्दर समुन्द्र जैसी द्रण इच्छा शक्ति रखते है और अपने मन में पर्वत जैसी स्थिरता रखते है जो यकींन मानिये आप जिस राह पर भी चलेंगे जिंदगी के हर मोड़ पर आप सफल होंगे और कामयाबी आपके कदम चूमेगी |
- अपने कर्तव्य पथ पर व्यक्ति को हमेशा अकेला ही चलना पड़ता है , लेकिन अपने कर्तव्य पथ पर ईश्वर को हमेशा अपने साथ लेकर चलना पड़ता है क्योंकि एक इश्वर ही वो शक्स है जो जिंदगी के हर मोड़ पे आपका साथ निभाने के लिए आप को मन की शक्ति देता है | और न दीखते हुए भी हमेशा हमारे साथ खड़ा होता है चाहे हम कोई भी अच्छा या बुरा काम कर रहे होते है वो इश्वर हमेशा अपना आशीस फेलाए हमे सद्बुद्दी देता है और हमे गलत राह पर जाने से रोकता है !
हिंदी साहित्य के महान कलाकार श्री मैथली शरण गुप्त ने लिखा है की -
नर हो, न निराश करो मन को
कुछ काम करो, कुछ काम करो
जग में रह कर कुछ नाम करो
यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो
कुछ तो उपयुक्त करो तन को
नर हो, न निराश करो मन को।
संभलो कि सुयोग न जाय चला
कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला
समझो जग को न निरा सपना
पथ आप प्रशस्त करो अपना
अखिलेश्वर है अवलंबन को
नर हो, न निराश करो मन को।
जब प्राप्त तुम्हें सब तत्त्व यहाँ
फिर जा सकता वह सत्त्व कहाँ
तुम स्वत्त्व सुधा रस पान करो
उठके अमरत्व विधान करो
दवरूप रहो भव कानन को
नर हो न निराश करो मन को।
निज गौरव का नित ज्ञान रहे
हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे
मरणोंत्तर गुंजित गान रहे
सब जाय अभी पर मान रहे
कुछ हो न तजो निज साधन को
नर हो, न निराश करो मन को।
प्रभु ने तुमको कर दान किए
सब वांछित वस्तु विधान किए
तुम प्राप्त करो उनको न अहो
फिर है यह किसका दोष कहो
समझो न अलभ्य किसी धन को
नर हो, न निराश करो मन को।
किस गौरव के तुम योग्य नहीं
कब कौन तुम्हें सुख भोग्य नहीं
जन हो तुम भी जगदीश्वर के
सब है जिसके अपने घर के
फिर दुर्लभ क्या उसके जन को
नर हो, न निराश करो मन को।
करके विधि वाद न खेद करो
निज लक्ष्य निरन्तर भेद करो
बनता बस उद्यम ही विधि है
मिलती जिससे सुख की निधि है
समझो धिक् निष्क्रिय जीवन को
नर हो, न निराश करो मन को
कुछ काम करो, कुछ काम करो।

👌👌👌👌
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